कहते हैं कि गौतम बुद्ध जो कभी एक राजकुमार थे, अपनी पत्नी यशोधरा और पुत्र राहुल को सोया हुआ छोड़, शांति की खोज में बिना बताए ही निकल गए थे। उन्ही की हृदय विदारक स्थिति को गुप्त जी ने यहाँ अपने शब्दों के जरिये परिभाषित करने का प्रयास किया है।
सखि, वो मुझसे कहकर जाते
कह, तो क्या मुझको वे अपनी पथ-बाधा ही पाते?
मुझको बहुत उन्होंने माना,
फिर भी क्या पूरा पहचाना?
मैंने मुख्य उसी को जाना,
जो मन मे वे लाते।
सखि, वो मुझसे कह कर जाते।
स्व्यं सुसज्जित करके क्षण में,
प्रियतम को, प्राणों के पण में
हमी भेज देती है, रण में-
क्षात्र-धर्म के नाते
सखि, वे मुझसे कहकर जाते।
हुआ न यह भी भाग्य अभागा,
किसपर विफल गर्व अब जागा?
जिसने अपनाया था, त्यागा;
रहे स्मरण ही आते।
सखि, वे मुझसे कहकर जाते।
नयन उन्हें है निष्ठुर कहते,
पर इनसे जो आँशु बहते,
सदय हृदय वे कैसे सहते?
गये, तरश ही खाते।
सखि, वे मुझसे कहकर जाते।
जाये, सिद्धि पाए वे सुख से,
दुखी न हो, इस जन के दुख से
उपालब्ध दूँ मै किस मुख से?
आज अधिक वे भाते।
सखि, वे मुझसे कहकर जाते।
गये, लौट भी वे आवेंगे
कुछ अपूर्व-अनुपम भी वो लावेंगे,
रोते प्राण उन्हें पावेंगे,
पर क्या गाते-गाते?
सखि, वे मुझसे कहकर जाते।
✍️मैथिली शरण गुप्त🥀


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