निबंध लेखन (Essay Writing )
'निबंध लेखन' किसी विषय पर अपने विचारो को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करना एक कला है। इस कला में विचारो के प्रस्तुतीकरण में कुछ बातो पर ध्यान दिया जाता है। जैसे :--
*भाषा का सरल और होना
* मुहावरों आदि का प्रयोग करके इसे सरल और रोचक बनाना।
* मौलिक विचारो को उचित अनुपात में प्रस्तुत करना
* विषय - वस्तु की भूमिका ,केंद्रीय भाव और उपसंहार को क्रमबद्ध तरीके से प्रस्तुत करना।
कुछ निबंधों के उदाहरण :--
गुरुपर्व
सिक्ख धर्म के पहले गुरु नानक देव जी का स्थान गुरुओ में सर्वोपरि माना जाता है। उनकी परम्परा का निर्वाह उनके बाद नौ अन्य महान व्यक्तियों ने किया। वे भी 'गुरु' कहलाए। इस प्रकार , सिक्ख धर्म के दस गुरु पूजनीय हो गए। इन्ही गुरुओ के जन्मदिवस को "गुरुपर्व" के रूप में मनाया जाता है।
सिक्ख धर्म के पवित्र पुस्तक का नाम 'गुरु ग्रन्थ साहिब' है ,जिसमे विभिन्न संतो की वाणी और उपदेश संकलित है। इन उपदेशो को 'सबद' कहा जाता है। प्रत्येक सिक्ख इसी पावन ग्रन्थ को अपना गुरु मानकर उसे श्रद्धापूर्वक नमन करते हैं।
सिक्ख गुरुओ ने हमें अपने आचरण को और ह्रदय को निर्मल रखने का पाठ पढ़ाया है। समय-समय पर उन्होंने ऊंच-नीच , छुआछूत आदि का भेद मिटाकर एक ही जाति ,'मानव जाति ' के रूप में जीवन जीने का सन्देश दिया है। इन गुरुओ के अनुसार हम सब एक ही ईश्वर की संतान है। इसलिए आपस में सुख -दुःख बांटना और एक दूसरे की हर परिस्थिति में मदद करना , सुख और आनंद का संचार करना हमारा मूलमंत्र होना चाहिए। प्रत्येक गुरुपर्व के अवसर पर कुछ दिन पहले से ही प्रभातफेरियाँ निकाली जाती है। इन प्रभातफेरियों में लोग सबद-कीर्तन गाते हुए गली- मोहल्ले में घूमते हैं। गुरुद्वारों को सजाया जाता है वहां गुरु ग्रन्थ साहिब का पाठ होता है। विशाल शोभायात्राएं निकाली जाती है। इन शोभा यात्राओ में स्त्री-पुरुष और बच्चो की टोलियाँ भजन-कीर्तन करती हुई वातावरण को भक्तिमय कर देती है। स्थान-स्थान पर प्रसाद वितरण किया जाता है और राह चलते लोगो को शरबत पिलाया जाता है।
सिक्ख समाज की एक अनूठी परम्परा , 'लंगर' है। गुरुद्वारे में लंगर का आयोजन किया जाता है जिसमे सब लोग सभी प्रकार के लोग सभी भेद-भाव को मिटाकर एक पक्ति में बैठकर प्रशाद के रूप में भोजन ग्रहण करते हैं। यह प्रशाद उनके लिए अमृत के सामान होती है। सामाजिक एकता का ऐसा अनूठा उदाहरण और कहीं नहीं मिलता। गुरुपर्व हमारे लिए एकता और भाईचारे का सन्देश लाता है। हमें इस पर्व से सिख लेनी चाहिए कि हम मानव को हमेसा एक दूसरे के काम आना चाहिए जिससे कि दुनिया से कष्ट की कमी हो जाए।
पुस्तकालय
पुस्तकालय शब्द का शाब्दिक अर्थ है - 'पुस्तक का आलय ' अर्थात पुस्तक का घर। यह वह स्थान है जहां अध्यन के लिए अनेक पुस्तक का संग्रह होता है। कोई भी पुस्तक प्रेमी अपनी ईक्षा और रूचि के अनुसार पुस्तकालय के शांत वातावरण में बैठकर अध्ययन कर सकता है।
पुस्तकालय मूल रूप से दो प्रकार के होते हैं - निजी पुस्तकालय और सार्वजनिक पुस्तकालय। निजी पुस्तकालय वह होता है जिसे कोई पुस्तक प्रेमी अपने शौक के अनुसार पुस्तक खरीदकर और एकत्रित करके तैयार करता है। इस प्रकार के पुस्तकालय का इस्तेमाल वह स्वयं करता है। कुछ पुस्तकालय सार्वजनिक होते हैं जिनको जान कल्याण के उपयोग के लिए बनाए जाते हैं। ऐसे पुस्तकालय सरकार द्वारा या निजी संस्थान द्वारा बनबाए जाते हैं। विद्यालयों में भी अपना निजी पुस्तकालय होते हैं , वहाँ के पुस्तकालयों का उपयोग , छात्र एवं शिक्षक करते हैं।
पुस्तकालयों का सबसे बड़ा लाभ यह है कि जिन पुस्तकों को खरीदकर पढ़ना आम आदमी के वश में नहीं होता ,उन्हें वे पुस्तक वहां या तो निशुल्क या फिर नाम मात्र शुल्क के साथ पढ़ने के लिए दिया जाता है। पुस्तकालय विभिन्न प्रकार के पुस्तकों को पढ़ने की रूचि तो जगाता है साथ ही ये पुस्तके अकेलेपन का भी अच्छा दोस्त होता है, जिससे समय की बर्बादी तो होती नहीं बदले में ज्ञान वर्धक हो जाता है।
पुस्तकालय के विषय में यही कहा जा सकता है कि यहां बैठकर पुस्तकों का अध्ययन करने से ज्ञान की वृद्धि होती है और स्वस्थ मनोरंजन भी होता है। पुस्तकालय वह माध्यम है, जो हमें अज्ञान के अन्धकार से प्रकाश की और ले जाता है। इसलिए इनसे हमें पूरा-पूरा लाभ उठाना चाहिए। हमारा कर्तब्य बनता है कि पुस्तकालयों में राखी पुस्तकों को नुक्सान न पहुंचाएं। क्योंकि ये बहुत से पुस्तक प्रेमियों के लिए उपयोगी होता है।
गणतंत्र दिवस
यह हमारा राष्ट्रिय पर्व है - गणतंत्र दिवस ,स्वतंत्रता दिवस और गांधी जयंती। इनमे से गणतंत्र दिवस हमारी सम्प्रभुता और राष्ट्र गौरव की याद दिलाता है। प्रतिवर्ष 26 जनवरी को यह पर्व देश की राजधानी दिल्ली से लेकर सुदूर गाँवो तक बड़ी भव्यता से मनाया जाता है। इस दिन प्रत्येक भारतीय के ह्रदय में उत्साह और उल्लास का सागर उम्र पड़ता है।
26 जनवरी का इतिहाष 1857 में पहलीबार रानी लक्ष्मीबाई ने शुरू किया था ,उसके बाद से हजारो क्रांतिकारियों ने देश को पूर्ण स्वतंत्रता दिलाने की सपथ खाई थी। इसके बाद स्वतंत्रता आंदोलन की रफ़्तार जो तेज हुई वो लाखो सेनानियों की कुर्बानी के बाद आखिरकार आजादी मिल ही गई और 15 अगस्त 1947 को हमारा देश पूर्णतः आजाद हो गया। किन्तु , सही मायने में यह पूर्ण स्वाधीनता नहीं थी , बल्कि इस दिन तो मात्रा अंग्रेजो के हाथ से सिर्फ सत्ता आ गई थी।
आजादी के पश्चात , 26 जनवरी 1950 को भारत को सम्प्रभुत्व संपन्न राष्ट्र घोषित किया गया। सही अर्थो में पूर्ण स्वतन्त्रता के लिए लोगो ने जो प्रतिज्ञा ली थी , वह अब जाकर पूरी हुई थी। इस दिन भारत ने अपना नया संविधान लागू किया था। तभी से प्रतिवर्ष 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस के रूप में मनाया जाता है यह राष्ट्रिय पर्व के रूप में धूम-धाम से मनाया जाता है। प्रातः काल के समय सभी प्रतिष्ठित स्थल पर बच्चे तथा नगर के सामान्य जन एकत्रित होते हैं। नगर के वरिष्ठ अधिकारी वहां ध्वजारोहण करते हैं। तत्पश्चात रंगारंग कार्यक्रमों और झांकियों का प्रदर्शन होता है।
दिल्ली में यह दिन राजपथ पर मनाया जाता है। राष्ट्रपति अपनी गाडी में बैठकर विजय चौक पर बने सलामी मंच तक पहुँचते हैं। वहां उपस्थित मंत्रीगण , राजदूत तथा तीनो सेनाओ के अधिकारी उनका स्वागत करते हैं। राष्ट्रपति जब राष्ट्रध्वज फहराते हैं , तो सेना की तीनो टुकड़ियां , पुलिस तथा एन सी सी के कैडेट उन्हें सलामी देते हैं। इसके बाद विभिन्न शास्त्रास्त्रों प्रदर्शन किया जाता है। तदुपरांत राजपथ पर विभिन्न राज्यों की झांकियां प्रस्तुत की जाती है। ये झाँकियाँ बहुत ही मनमोहक होती है जो आयोजन में चार चाँद लगाती है। आकाश में विमानों का भी कर्तव्य दिखाया जाता है। इस पुरे कार्यक्रम का प्रशारण टेलीविजन एवं रेडियो पर होता है , जिसे दुनिया के किसी कोने में बैठे लोग इसका आनंद उठा पाते हैं।
हमने अपने स्वतंत्रता के लिए बहुत बड़ी कीमत चुकाई है। इसलिए , हमें गणतंत्र दिवस पर देश के सम्मान की रक्षा के लिए प्रतिज्ञा लेनी चाहिए , ताकि हमारे क्रांतिकारियों बलिदान व्यर्थ न जाए।
यदि मै प्रधानमंत्री होता
भारतीय संविधान के अनुसार , भारत की सर्वोच्च सत्ता राष्ट्रपति के हाथो में होती है। राष्ट्रपति देश के शाशन का संचालन प्रधानमंत्री के माध्यम से करते हैं। इस दृष्टि से , भारत जैसे देश का प्रधानमंत्री बनने का अर्थ है - जनता के लिए समर्पित एक सेवक के रूप में करना।
जब मै अपने आस-पास के लोगो की दुर्दशा को देखता हूँ तो मेरा मन कुंठित होने लगता है ,और मई सोच में पर जाता हूँ कि कैसे गरीबो को कम से कम पौष्टिक भोजन और रहने के लिए आवाश और जरुरी वस्त्र का उपाय कर सकूं। अगर मै प्रधानमंत्री होता तो इसकी व्यवस्था अवश्य करता।
यदि मै इस देश का प्रधानमंत्री बन यहां के लोगो की शाशक के रूप में नहीं बल्कि सेवक के रूप में सेवा करता। मै खेत-खलिहानो और कारखानों में काम करने वाले लोगो , किसानो-श्रमिकों के हितो की रक्षा हेतु उनके बिच बैठकर उनकी परेशानियों को सुनता और उनके भलाई के लिए नई योजनाए बनाता।
देश इस समय कोरोना नाम के महामारी से जूझ रहा है ,उसके लिए हर संभव प्रयाश करता , ऐसे हमारे प्रधानमंत्री भी पूरी तरह कोशिश में लगे हैं लेकिन ये महामारी ही ऐसी है कि बहुत साड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।
शिक्षा हमारे देश की जनता का मूल अधिकार है। सबको शिक्षा , सबको भोजन , सबको आवाश और वस्त्र सुनिश्चित करता। ख़ुशी है की हमारे तत्कालीन प्रधानमंत्री इन सभी कार्यो में तत्परता से लगे हुए है,और भ्रष्टाचारों पर भी काबू पाया है , जो मै भी प्रधान मंत्री बनाने के बाद करना चाहता। हमारा देश भारत कभी विश्व गुरु था , फिर से उसको वही स्थान दिलाने के लिए अपनी जी जान लगा देता।
महात्मा बुद्ध
इस धरती पर समय-समय पर ऐसे संत-महात्मा अवतरित हुए हैं , जिन्होंने हमें जीने का मार्ग बताया है। हजारो पहले एक ऐसे ही संत पैदा हुए थे , जिन्हे दुनिया ने महात्मा बुद्ध के नाम से जाना। उनका जन्म हिमालय की गोद में बसे लुम्बिनी नामक स्थान में हुआ था। उनके पिता कपिलवस्तु के राजा थे। महात्मा बुद्ध के बचपन का नाम सिद्धार्थ था।
बचपन से ही राजकुमार सिद्दार्थ का स्वाभाव अलग था। वे हमेसा जीवन के रहस्य ढूंढने की चेष्टा किया करते थे। बेटे की इस दशा को भांपकर उनके पिता ने उनका विवाह यशोधरा नामक कन्या से करा दिया। यशोधरा और सिद्धार्थ के एक पुत्र हुए, जिनका नाम 'राहुल'रखा गया।
फिर भी उनका मन किसी राजनैतिक कार्य में नहीं लगता , तो एक दिन राजकुमार ने सांसारिक मोह-माया को त्याग दिया और वे राजमहल को छोड़कर वन की ओर चले गए। इधर-उधर भटकने के बाद बिहार के बोधगया स्थान पर पहुंचे। वहां एक वटवृक्ष के तपस्या में लीन होने के बाद उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई , और वे 'महात्मा बुद्ध' कहलाने लगे। बोध प्राप्त करने के बाद वह वटवृक्ष 'बोधिवृक्ष' के नाम से जाना गया। महात्मा बुद्ध ने अहिंसा का पाठ पढ़ाया और सभी जीवो पर दया करने का संदेस दिया। उनका मानना था की ज्ञान , सत्य और शान्ति की प्राप्ति उसी मनुष्य को हो सकती है जो जीवन और मृत्यु के चक्र से नहीं घबराता। सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलते हुए जीवन में मनुष्य को सफलता अवश्य मिलती है। बुद्ध के अनुयाई 'बौद्ध भिक्षु ' कहलाए और उनका बताया हुआ मार्ग 'बुद्ध धर्म' कहलाया।
आज भी बौद्ध धर्म को मानने वाले लोग भारत के अलावे दुनिया के कई देशो में फैला हुआ है।
महात्मा बुद्ध का जीवन त्याग से भरा था। हमें उनका संदेश ,'अहिंसा परमो धर्मः 'अपनाकर जीवन में अच्छे कर्मो के लिए जीवन में अपने -आप को ढालने का प्रण लेना चाहिए।
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