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रविवार, 2 मई 2021

अनुच्छेद लेखन (Paragraph writing) "शिक्षक दिवस ","समय का सदुपयोग","अभ्यास का महत्व", "आदर्श विद्यार्थी", "झाँसी की रानी", "राष्ट्र के प्रति हमारे कर्तव्य"


अनुच्छेद लेखन (Paragraph writing) 

किसी विषय, घटना, व्यक्तित्व, संस्मरण आदि से सम्बंधित विचारो को या उसके प्रति मन में घूम रहे विचारो और भावो को सिमित वाक्यों में किन्तु क्रमबद्ध रूप में व्यक्त करना अनुच्छेद लेखन कहलाता है। 

जैसे :--

                                             शिक्षक दिवस 

शिक्षक के हाथो देश का भविष्य होता है , जो बच्चो में ज्ञान का दिप जला इस समाज और समाज का भविष्य उज्जवल करते हैं। हमारे देश में गुरु का स्थान भगवान् से भी ऊंचा रखा गया है और उनको सम्मानित करने के लिए 5 सितम्बर को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है।  इसी दिन देश के भूतपूर्व राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधा कृष्ण का जन्म हुआ था। वे एक  समर्पित अध्यापक थे। विभिन्न भाषाओ के ज्ञाता और प्रकांड विद्वान् , डॉ. राधाकृष्ण को राष्ट्रपति बनने पर उनके जन्मदिन को 'शिक्षक दिवस' के रूप में मनाने का फैसला किया गया। 5 सितम्बर के दिन विद्यालयों में शिक्षक दिवश धूमधाम से मनाया जाता है। इस शिक्षक और छात्र अपने-अपने विचार प्रस्तुत करते हैं। शिक्षा और शिक्षक से सम्बन्धी कई कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है। सरकार की और से भी शिक्षक दिवस के दिन आदर्श शिक्षकों को सम्मानित किया जाता है। जो की अन्य शिक्षकों के लिए प्रेरणा का श्रोत बनता है। हम छात्रों को भी शिक्षक दिवस के दिन यह प्रण लेना चाहिए कि हम उनके सम्मान करे और उनके बताए हुए मार्ग पर चलकर राष्ट्र को एक सुशिक्षित और सभ्य समाज दे। 

                                                           समय का सदुपयोग 

समय  किसी की प्रतीक्षा नहीं करता , वो हमेसा गतिमान रहता है। इसलिए हमे हमेसा उसकी क़द्र करनी चाहिए , क्योकि गया हुआ समय वापस नहीं आता। हमें हमेसा समय के अनुसार अपने-आप को ढालकर उचित समय पर उचित कार्य करना चाहिए। समय का सदुपयोग ही बुद्धिमानी का काम है। अगर समय नष्ट हो गया तो फिर वापस नहीं आएगा और इसकी क्षतिपूर्ति भी असंभव है। हम अपने- आप को भाग्य के भड़ोसे छोड़ देते हैं, लेकिन भाग्य भी उसी का साथ देता है जो मेहनत और  लगन से समय पर अपना काम करता चले। वैसे लोग अपने भाग्य के निर्माता खुद होते हैं। जब हम किसी भी महापुरुष की जीवनियाँ पढ़ते हैं , तो ऐसे अनेक उदाहरण मिल जाते हैं जो उन्होंने समय का सदुपयोग किस प्रकार और  किस बुद्धिमता से किया और सम्पूर्ण  लिए पूजनीय बने। समय का सदुपयोग वह मूलमंत्र है , जो हमें सफलता के शिखर पर पहुंचा सकता है। अतः हमें समय रहते , समय की पहचान कर समय पर ही उचित अवसर का लाभ उठाने के लिए तैयार रहना चाहिए। 

                                           अभ्यास का महत्त्व 

सफलता प्राप्त करने का एकमात्र साधन अभ्यास है।  अभ्यास ही है जो भाग्य को जीवन की पटरी  पर लाकर सही दिसा  प्रदान करता है। विश्व में जितने भी महापुरुष हुए हैं उन्होंने अभ्यासरूपी साधना को ही जीवन का सार बनाकर अपने लक्ष्य को प्राप्त किया था। अभ्यास की प्रक्रिया इतनी प्रवल होती है कि  जब हमारा भाग्य पर से विश्वास उठ जाता है तब  अभ्यास की प्रक्रिया हमें मंजिल तक पहुंचाती है। 'अभ्यास ' मतलब आपका किया हुआ श्रम , जो कि आपके सफलता की सीढ़ी होती है। जैसे कि अर्जुन द्वारा किया हुआ अभ्यास  के परिणाम से उसे पूरी चिड़ियाँ नहीं, बल्कि सिर्फ उसकी आँख दिखती है।  और न जाने कितने महान लोग हैं, जिन्होंने अपने अभ्यास के दम  पर कठिन मंजिलो को प्राप्त किया है। आज के युग में हमारे प्रधान मंत्री नरेंद्र दामोदर दास मोदी को भी खा जा सकता है , जिन्होंने अपने मेहनत  के बल पर एक चाय वाले से मुख्य मंत्री और प्रधान मंत्री तक का सफर तय किया। स्कूल में भी परीक्षा में वही छात्र अच्छे अंक प्राप्त कर पाते हैं जो अपने अभ्यास को  पूरी तरह समर्पण के साथ  दिनचर्या में जारी रखते है। अतः हर इंसान या छात्र जिनको जीवन में कुछ महत्त्वपूर्ण लक्ष्य प्राप्त करने हो तो उन्हें अपने अभ्यास पर  पूरा ध्यान देना चाहिए। 

                                                     आदर्श विद्यार्थी 

विद्या अर्जित करने वाला विद्यार्थी कहलाता है।  आदर्श विद्यार्थी वे होते हैं जिनका अपने समाज और देश की उन्नति में महत्वपूर्ण योगदान हो।  वे देश के कर्णधार माने जाते हैं और विद्यार्थी जीवन में ही मानवता की नीव मजबूत होती है। जिस देश के बालक अध्यन के क्षेत्र में जितनी उन्नति करते हैं , उस देश का भविष्य उतना ही उज्जवल मन जाता है।  आदर्श विद्यार्थी वे होते हैं जो अध्यन के क्षेत्र में चरित्रवान,  ,कर्तव्यनिष्ठ और शिष्टाचारी बनने की चेष्टा करता है। ऐसे विद्यार्थी को जीवन में बहुत सारे समझौते करने होते हैं। संस्कृत के एक श्लोक के अनुसार विद्यार्थी को पढ़ाई में कौए की भाँती चेष्टा करनी चाहिए , बगुले की भाँती ध्यान लगाना होता है , कुत्ते की भाँति उसकी नींद हो जो कि सोए हुए में भी सजग हो।  इतना ही नहीं ,उसे अधिक भोजन से भी परहेज करना चाहिए और गृहत्याग , अर्थात घर की चिंता से अपने-आप को अलग रखना चाहिए।  विद्यार्थी जीवन में बालको को ' सदा जीवन उच्च विचार' की निति अपनाने पर भी जोड़ देना चाहिए। पढ़ाई के साथ-साथ व्यायाम और खेलकूद पर भी ध्यान देना चाहिए , क्योंकि स्वस्थ तन में ही स्वस्थ मन का वास होता है।  हम यह कह सकते हैं कि विद्यार्थी जीवन वह अनमोल काल है जिसके सदुपयोग पर ही  सफलता का ढांचा टिका है। अतः इसका सदुपयोग समय रहते करना चाहिए। 

 

                                                    झाँसी की रानी 

अंग्रेजो के नाको चने चबबाकर उनके पसीने छुड़वाने वाली वीरांगना रानी लक्ष्मी बाई की वीरता और वलिदान की कहानी आज भी हमारे लिए प्रेरणा स्रोत बने हुए हैं। उनका जन्म 19 नवम्बर  1835 को झांसी में हुआ था। वे भागीरथी देवी तथा  मोरोपंत की संतान थी।  उनके बचपन का नाम 'मनु' था। मनु जब चार वर्ष की थी ,तभी उनकी माता जी का देहांत हो गया था।  तब उनका लालन-पालन बाजीराव पेशवा के पुत्रो नानासाहेब तथा रावसाहेब के साथ बिठूर (कानपुर) में हुआ। वहीँ उन्होंने घुड़सवारी और तलवार चलाने की कला सीखी।  चतुर किन्तु चंचल मनु को बाजीराव 'छबीली '  थे। मनु का विवाह जब झांसी के महाराज गंगाधर राव  हुआ, तब वह झाँसी की रानी लक्ष्मी बाई के नाम से जानी जाने लगी।  रानी लक्ष्मीबाई अपने व्यवहार से सब दास-दासियो की चाहती बन गई। रानी अपने दासियो को भी घुड़सवारी , तलबारबाजी आदि में दक्ष बना दिया था। दुर्भाग्य से महाराज गंगाधर राव की मृत्यु हो गई।  इसके बाद अंग्रेजो की दृष्टि झांसी के किले पर टिकी थी।  तब लक्ष्मीबाई ने भी प्राण किया कि वह अंग्रेजो को देश से भगाकर हो दम लेंगी। सं 1857 के विद्रोह में लक्ष्मीबाई ने झांसी राज्य की ओर  से बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।  अंततः अंग्रेजो के साथ लड़ते -लड़ते उन्हें अपने-अपने प्राण गवाने पड़े। लक्ष्मीबाई  लोगो के धोखे की वजह से अंग्रेजो को पूर्ण रूप से परास्त नहीं कर पाई। लेकिन भारत की आजादी की पहली लड़ाई में उन्होंने जो योगदान दिया , उसे आज भी  है। 


                                    राष्ट्र के प्रति हमारे कर्तव्य 

हर जिम्मेदार नागरिक  का राष्ट्र के प्रति कुछ उत्तरदायित्व होता है।  हमारे कर्तव्य ही विश्व में हमारे राष्ट्र की विशिष्ट पहचान बनाते हैं। उदाहरण के लिए, आज भी विश्व गणित के क्षेत्र में भारत का लोहा मानता है क्योंकि यहाँ के सपूत ने विश्व को 'शून्य'का ज्ञान दिया था।  यह वही 'शून्य' है, जिसके  बिना  गणितीय गणनाओ का अस्तित्व ही नहीं हो सकता। राष्ट्रवादी व्यक्ति का कर्तव्य होता है कि वह राष्ट्रिय सम्पत्तियों को अपनी संपत्ति समझे  के प्रति लापरवाही न बरते।  हड़ताल, तोड़-फोड़ धार्मिक उन्माद आदि घटनाए रोककर इन सम्पत्तियों के नुक्सान को बचाना चाहिए। शिक्षा खेल-कूद आदि क्षेत्रों में हम इतनी प्रगति करे कि राष्ट्र की प्रगति निरंतर होती रहे और हमारा देश विकसित देश बन जाए। एक विकसित राष्ट्र  ही आत्मनिर्भर देश कहलाता है। राष्ट्र के गौरव की रक्षा के लिए   पड़े, तो हमें पीछे नहीं हटना चाहिए. जैसे हमारे सैनिक बॉर्डर पर करते हैं। अतः हमें राष्ट्र के प्रति अपने कर्तब्यो को पूरा करके  देश का मस्तक ऊंचा उठाना चाहिए। 

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