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गुरुवार, 13 मई 2021

राम - लक्ष्मण - परशुराम संवाद विश्लेषण के साथ।(class 10 )


1 ) नाथ संभुधनु भंजनिहारा, होइहि केउ एक दास तुम्हारा।।

आयेसु काह कहिअ किन मोही। सुनी रिसाई बोले मुनि कोही।।

सेवकु सौ जो करै सेवकाई। अरिकरनी  करि करिअ लराई।।

सुनहु राम जेहि सिवधनु तोरा। सहसबाहु सम सौ रिपु मोरा।।

सो बिलगाउ बिहाइ समाजा। न त मारे जैहहिं सब राजा।।

सुनी मुनि वचन लखन मुसकाने। बोले परसुधरहि अवमाने।।

बहु धनुहीं तोरी लरिकाईं। कबहुँ न असि रिस किन्ही गोसाईं।।

एहि धनु पर ममता केहि हेतु। सुनी रिसाइ कह भृगुकुलकेतू।

 रे नृप बालक काल बस बोलत तोहि न सँभार। 

धनुही सम तिपुरारि धनु बिदित सकल संसार।।

व्याख्या :--    प्रस्तुत पद राम - लक्ष्मण - परशुराम संवाद से लिए गए हैं। ये पद रामचरित मानस के बालकाण्ड 'राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद ' में सीता-स्वयंवर के समय शिव धनुष के तोड़े जाने के बाद परशुराम जी के क्रोधित होने पर राम - लक्ष्मण और परशुराम के बिच जो संवाद होता है , उसकी चर्चा इस पद में की गई है। 

परशुराम जी के क्रोध को  शांत करने के लिए राम जी कहते हैं, हे नाथ जिस किसी ने भी इस शिव धनुष को तोड़ा है ,वो निश्चय ही आपही का कोई दास होगा। राम की बात सुनकर परशुराम जी और क्रोधित होकर कहते हैं की दास वह होता है जो गुरु की सेवा करता हैं , परन्तु जो गुरु का अपमान करे वो दास नहीं शत्रु  होता है।  परशुराम जी कहते हैं , की सुन लो राम !जिसने भी मेरे अराध्य शिव का धनुष तोड़ा है वो सहसबाहु की तरह मेरा शत्रु है , इसलिए जिस किसी ने इस धनुष को तोड़ने तोड़ने का दुःसाहस किया है वो स्वयं इस इस राज-समाज से निकलकर बाहर आ जाए अन्यथा मै यहाँ प्रस्तुत प्रत्येक राजा का बढ़ कर दूंगा। 

परशुराम जी के क्रोध को देखकर लक्ष्मण मुस्कुराते हुए कहते हैं कि "हे मुनिवर ! हमने बचपन में न जाने खेल-खेल में कितने धनुष तोड़ डाले , परन्तु तब तो आपने क्रोध नहीं किया।  फिर आपको इसी धनुष से इतनी ममता क्यों है ?"

लक्ष्मण के इस तरह अपमान भरे शब्दों को सुन भृगवंश की ध्वजा के रूप में परशुराम गुस्से में भरकर कहते हैं"अरे मुर्ख , अबोध बालक यमराज के वश में होने के कारण तुझे होश नहीं है।  सारे संसार में प्रशिद्ध भगवान शिव का धनुष , क्या सामान धनुष के सामान है? तुम शिव के धनुष को सामान धनुष के बराबर कह शिव धनुष का अपमान क्र रहे हो। 

2 ) लखन कहा हँसि हमरे जाना। सुनहु देव सब धनुष समाना।।

का छति लाभु जून धनु तोरें। देखा राम नयन के भोरें।।

छुअत टूट रघुपतिहु न दोसु। मुनि बिनु काज करिअ कत  रोसू।।

बोले चितइ परशु की ओरा। रे सठ सुनेहि सुभाउ न मोरा।।

बालकु बोली बधउँ नहि तोहि। केवल मुनि जड़ जानहि मोह।।

बाल ब्रह्मचारी अति कोही। विश्व विदित छत्रियकुल द्रोही।।

भुजबल भूमि भूप बिनु किन्ही।  बिपुल बार महिदेवन्ह दीन्हि।। 

सहसबाहु भुज छेद निहारा। परसु बिलोकु महीपकुमारा।।

मातु पितहि जनि सोचबस करसि महिसकिसोर। 

गर्भन्ह के अर्भक दलन परसु मोर अति घोर।।

व्याख्या :--    परशुराम जी को लक्ष्मण जी कहते हैं, उनके लिए तो सारे धनुष एक समान है। पुराने धनुष को तोड़ने से क्या लाभ, क्या हानि ! श्री राम चंद्र जी ने तो इसे नया समझकर धोखे से देखा था , परन्तु यह तो इतना पुराना निकला कि राम जी के छूते  ही टूट गया इसमें रघुकुल श्री राम का कोई दोष नहीं है।  आप अकारण ही क्रोधित हो रहे हैं। इसके पश्चात परशुराम अपने फरसे की और देख कर कहते हैं कि "अरे दुष्ट !तुम मेरा स्वभाव नहीं जानते , तुम अभी तक जीवित हो क्योंकि मै तुम्हे बालक समझकर छोड़ रहा हूँ।  मुर्ख तू मुझे समान्य मुनि समझने की भूल न कर।  मै एक ब्रह्मचारी हूँ जिसे अपना परिचय देने की आवस्यकता नहीं है। मै और कोई नहीं छत्रिय कुल का नासक हूँ , जिसने अपनी भुजाओ के बल पर पृथ्वी को दुष्ट राजाओ से मुक्त किया एवं कई बार इसे ब्राह्मण को दान कर दिया।  हे राजकुमार !सहस्त्रबाहु के भुजाओ को काट देने बाले इस फरसे को देख।  अरे राजा के बालक !तू  अपने माता - पिता को चिंता के वश में डालने वाला है , क्योंकि तू ऐसे ऋषि के समक्ष अपना दुस्साहस दिखाने का कार्य कर रहा है , जिसके क्रोध की कोई सीमा नहीं है।  मै तो उस कुल का नाशक हूँ , जो गर्भ में पल रहे बच्चे को भी बड़ी बुरी तरह वध कर सकता हूँ। 

3 )बिहसि लखनु बोले मृदु बानी। अहो मुनीसु महा भट मानी।।

पुनि पुनि मोहि देखाव कुठारु। चहत उड़ावन फुकी पहारू।।

इहाँ कुम्हड़बतिया कोउ नाही।  जे तरजनी देखि मरिजाहिं।।

देखि कुठारु सरासन बाना। मै कछु कहा सहित अभिमाना।।

भृगुसुत समुझि जनेउ बिलोकी। जो कछु कहहु सहउँ रिस रोकी।।

सुर महिसुर हरिजन अरु गाई। हमरे कुल इन्ह पर न सुराई।।

बधें  पापु अपकीरति हारै। मारतहूँ पा परिय तुम्हारे।।

कोटि कुलिस सम बचनु तुम्हारा। व्यर्थ धरहु धनु बाण कुठारा।।

जो बिलोकि अनुचित कहेउँ छमहु महामुनि धीर। 

सुनी सरोष भृगुवंशमणि बोले गिरा गंभीर।।

व्याख्या :--  परशुराम जी के अहंकार भरे शब्दों को सुनकर लक्ष्मण जी हँसते हुए मधुर वाणी में मुनिवर पर व्यंग्य करते हुए कहते हैं - लक्ष्मण जी कहते हैं , आप वीर योद्धा हैं, अपना कुठारी बार-बार दिखाकर मुझे भयभीत न करे। ऐसा प्रतीत होता है जैसे आप फुक मार कर पहाड़ उड़ा देना चाहते हैं।  लेकिन यहाँ कुम्हड़बतिया कोई नहीं है जो आपकी तर्जनी (अंगूठे के बगल वाली ऊँगली)  कर डर जाए। इसके बाद लक्ष्मण -परशुराम से कहते हैं कि उन्होंने जो कुछ कहा है , वह आपके कुल्हारे और धनुष - वाण को देखकर ही अभिमान सहित कहा है।  भृगुवंशी समझकर या आपका यगोपवित देखकर , मै अपना क्रोध रोक लेता हूँ।  फिर अपने कुल की परम्परा को बताते हुए लक्ष्मण कहते हैं  कि हमारे वंश में देवता, ब्राह्मण, भगवान् के भक्त और गाय - इन पर हमारे कुल में अपनी वीरता का प्रदर्शन नहीं किया  जाता क्योंकि इन्हे मारने से पाप लगता है और इनसे हार जाने पर अपकीर्ति होती है।  इसलिए आप मारना चाहे तो भी आपके पैर ही  पड़ेंगे हम। 

लक्ष्मण व्यंगात्मक रूप में कहते हैं कि  हे मुनिवर आप व्यर्थ ही धनुष-वाण  और कुठार रखते हैं , जबकि आपके  वचन ही बहुत है , आपको युद्ध करने की क्या आवस्यकता है ? आप अपने निर्मम वचनो के प्रहार से ही शत्रुओ का नाश कर सकते हैं। आपके धनुष और कुठारे को देखकर अगर मैंने कुछ अनुचित कहा है , तो हे धीर मुनि आप क्षमा कीजिए। यह सुनकर भृगुवंशमुनि परशुराम क्रोध के साथ गंभीर वाणी में बोले। 

4 ) कौसिक सुनहु मंद यह बालकु।  कुटिल कालबस निज कुल घालकु।।

भानु वंश राकेस कलंकु। निपट निरंकुस अबुध असंकु।।

काल कवलु होइहि छन माहीं। कहउँ पुकारि खोरि मोहि नाहि।।

तुम्ह हटकहु जौं चहहु उबारा। कहि प्रतापु बलु रोषु हमारा।।

लखन कहेउ मुनि सुजसु तुम्हारा।  तुम्हहि अछत को बरनै पारा।।

अपने मुँह  तुम्ह आपनी करनी। बार अनेक भाँति बहु बरनी।।

नहि संतोषु त पुनि कछु कहहु।  जनि रिस रोकि दुसह दुख सहहु।।

बीरब्रती तुम्ह धीर अछोभा। गारी डेत  न पावहु सोभा।।

सूर समर करनी करहिं कहि न जनावहिं आपु। 

बिधमान रन पाइ रिपु कायर कथहिं प्रतापु।।

व्याख्या :--  लक्ष्मण के वचन सुनकर परशुराम जी कौशिक यानि जो राम और लक्ष्मण के गुरु हैं 'विस्वामित्र' उनको संबोधित करते हुए कहते हैं कि- देखिए कौशिक काल के वश में होने के कारण यह बालक अपने कुल का नाश करेगा। यह बालक अपने सूर्यवंशरुपी चन्द्रमा का कलंक है।  यह बिलकुल निडर , मुर्ख एवं अबोध है। अभी कुछ ही क्षणो में यह  मौत का ग्रास बन जाएगा इस भरी सभा में मै सभी को कह देता हूँ कि इसके मारे जाने  के बाद कोई मुझे दोष नहीं देगा। अगर आप सभी इस अबोध बालक को बचाना चाहते हैं तो इसे हमारे प्रताप ,बल और साहस का परिचय देकर समझा दे। यह सुन लक्ष्मण कहते हैं कि आपके सुयस का बखान आपके रहते और कौन कर सकता है ,अपने वीरता की बखान तो आप खुद  मुँह से करे जा रहे हैं। अपने क्रोध को रोककर आप दुःख मत साहिए।  आप वीरता का व्रत धारण करने वाले धैर्यवान और क्षोभ रहित है।   शूरवीर तो युद्ध में अपनी वीरता दिखाते हैं इसतरह राज-समाज में अपनी वीरता का प्रदर्शन नहीं करते। शत्रु को युद्ध में पाकर कायर ही  प्रताप की डींगे हांकते हैं। 

5 ) तुम्ह तौ कालू हाँक जनु लावा। बार बार मोहि लागि बोलाबा।।

सुनत लखन के बचन कठोरा। परसु सुधारि धरेउ कर घोरा।।

अब जनि देइ दोसु मोहि लोगू। कटुबादी बालकु बधजोगू।।

बाल बिलोकि बहुत मै बाँचा। अब यहु मरनिहार भा साँचा।।

कौसिक कहा छमिय अपराधू। बाल दोष गुन गनहि न साधू।।

खर कुठार मै अकरुन कोही। आगे अपराधी गुरु द्रोही।।

उत्तर देत छोरउ बिनु मारें। केवल कौसिक सील तुम्हारे।।

न त एहि काटि कुठार कठोरे। गुरहि उरिन होतेउँ श्रम  थोरे।।

गाधिसुनु कह हृदयँ हँसि मुनिहि हरिअरइ सूझ। 

अयमय खाँड़ न ऊखमय अजहुँ न बूझ अबूझ।।

व्याख्या :--  लक्ष्मण कहते हैं कि हे मुनिवर !ऐसा प्रतीत होता है कि आप  काल को मेरे लिए हाँक लगाकर बुला रहे हैं   लक्ष्मण के कठोर वचन सुनकर परशुराम जी अत्यंत क्रोधित हो जाते हैं और अपने फरसे को सुधारकर हाथ में लेते हुए कहते हैं कि अब लोग मुझे कदापि दोष न दे। यह कड़वा बोलने वाला बालक मर जाने के ही योग्य है।  मैंने इसे बालक समझकर बहुत बर्दास्त किया है ,परन्तु यह सचमुच मरने को ही तत्पर है। परशुराम  के क्रोध को देखते हुए , राम-लक्ष्मण के गुरु विश्वामित्र विनम्र भाव से परशुराम जी को कहते हैं कि हे मुनिवर ! इसके अपराध को क्षमा करे।  बालको के गन और दोष को गुरु नहीं गिनते। इसके उत्तर में परशुराम कहते हैं कि मेरा तीखी धार का फरसा , तथा मै खुद अत्यंत क्रोधी और दया रहित हूँ एवं मेरे सामने गुरु द्रोहि उत्तर दे रहा है। इसे इसके दंड के लिए सजा नहीं मिल रही उसका एकमात्र कारण ,विश्वामित्र आपका शील एवं प्रेम है नहीं तो इसी कठोर फरसे से लक्ष्मण का वध बड़े ही थोड़े परिश्रम से कर अपने गुरु के ऋण से मुक्त हो जाता। 

परशुराम के क्रोध भरे  वाणी को सुन विश्वामित्र मन ही मन मुस्कुराकर कहते हैं कि मुनिवर को हरा-ही - हरा दिख रहा है। अन्य सभी जगह विजयी होने के कारण ये राम - लक्ष्मण को भी साधारण क्षत्रिय मान रहे हैं। पर वे ये नहीं जानते कि ये क्षत्रिय लोहे की खाँड है। कोई गन्ने की खाँड नहीं  है जो मुँह में डालते ही गल जाते हैं।  मुनिवर अब भी नासमझ बने हुए हैं और इनके प्रभाव को नहीं समझ पा रहे हैं। 

6 ) कहेउ लखन मुनि सीलु तुम्हारा। को नहिं जान बिदित संसारा।।

माता पितहि उरिन भए नीकें। गुर रीनू रहा सोचु बड़ जीकें।।

सो जनू  हमरेहि माथे काढ़ा।  दिन चलि गए ब्याज बड़ बाढ़ा।।

अब आनिअ ब्यवहरिआ बोली। तुरत देउँ मैं थैली खोली।।

सुनी कटु बचन कुठार सुधारा। हाय हाय सब सभा पुकारा।।

भृगुबर परसु देखावहु मोही।  बिप्र बिचारि बचउँ नृपदोही।।

मिले न कबहुँ सुभट रन गाढ़े। द्विज देवता घरहि के बाढ़े।।

अनुचित कही सब लोग पुकारे। रघुपति सयनहिं लखनऊ नेवारे।।

लखन उतर आहुति सरिस भृगुबर कोपु कृसानु। 

बढ़त देखि जल सम वचन बोले रघुकुलभानु।।

व्याख्या :-- अंततः लक्ष्मण व्यंग रूप में परशुराम को कहते हैं कि हे मुनिवर !आपके शील को कौन नहीं जानता ?वह संसार भर में प्रशिद्ध है।  माता-पिता के ऋण से तो आप भली -भाति मुक्त हो चुके हैं।  अब आप पर गुरु ऋण रह गया है , जिसका आपके मन पर बड़ा बोझ रह गया है।  आप इसके कारण बड़े चिंतित जान पड़ते हैं। वह ऋण मानो हमारे ही माथे  निकला है। बहुत दिन बित  गए हैं , इस ऋण को , एवं इसका व्याज भी काफी बढ़ गया होगा , आप किसी हसाब -किताब करने वाले को बुला ले , तो मै तुरंत थैली खोलकर चुका दूँ।  इतना सुनते ही परशुराम के क्रोध पर कोई काबू न रहा , और उन्होंने अपना कुठारु जैसे ही संभाला , समस्त राज-समाज हाय ! हाय !  कर पुकार उठा। तभी लक्ष्मण कहते हैं कि हे भृगु श्रेष्ठ ! आप मुझे फरसा दिखा रहे हैं ? पर हे राजाओ के शत्रु ! मै आपको ब्राह्मण समझकर बचा रहा हूँ। लगता है, आपको कभी रणधीर, बलबान वीर नहीं मिले।  हे ब्राह्मण देवता ! आप घर ही में बड़े हैं।  यह सुनते ही सारी  राजसभा पुकार उठी ,  यह अनुचित है ! अनुचित है ! तब रघुकुलपति श्री राम ने इशारे से लक्ष्मण को रोक दिया एवं आहुति के सामान शीतल वचन कहे। उन्होंने परशुराम को श्र्ष्ठ मुनिवर कहते हुए अपने क्रोध को शांत कर अपने दास को पहचानने के लिए आग्रह किया। 

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