दिनकर जी की कविता, रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद।(1946) में लिखी गई।
रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद
आदमी भी क्या अनोखा जीव होता है ?
और फिर बेचैन हो जगता, न सोता है।
जानता है तू कि मै कितना पुराना हूँ,
मै चुका हूँ देख मनु को जनमते-मरते,
और लाखों बार तुझ-से पागलों को भी
चाँदनी में बैठ स्वप्नों पर सही करते।
आदमी का स्वप्न ? है वह बुलबुला जल का,
आज उठता और कल फ़िर फूट जाता है,
किन्तु, तो भी धन्य, ठहरा आदमी ही तो ?
बुलबुलों से खेलता, कविता बनाता है।
मै न बोला, किन्तु, मेरी रागिनी बोली,
चाँद! देख फिर से, मुझको जानता है तू ?
स्वप्न मेरे बुलबुले है, है यही पानी ?
आग को भी क्या नही पहचानता है तू ?
मैं न वह जो स्वप्न पर केवल सही करते,
आग में उसको गला, लोहा बनाती हूँ
और उसपर नीव रखती हूं नए घर की,
इस तरह दीवार फ़ौलादी उठाती हूँ।
मनु नही, मनु-पुत्र है यह सामने जिसके,
कल्पना की जीभ में भी धार होती है,
वाण ही होते, विचारों के नही केवल,
स्वप्न के भी हाथ मे तलवार होती है।
स्वर्ग के सम्राट को जाकर खबर कर दे
रोज ही आकाश चढ़कर जा रहे हैं वे।
रोकिए जैसे बने इन स्वप्न वालो को
स्वर्ग की ही ओर बढ़ते जा रहे हैं वे,
स्वर्ग की ही ओर बढ़ते आ रहे हैं वे।
✍️ Ramdhari Singh Dinkar💐
रामधारी सिंह दिनकर Ramdhari Singh Dinkar की कविता "सिंघासन खाली करो कि जनता आती है।


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