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मंगलवार, 16 फ़रवरी 2021

मौन निमंत्रण ( सुमित्रा नन्दन पन्त)-Sumitranandan Pant

मौन निमंत्रण, सुमित्रानंदन पंत 


 

मौन निमंत्रण, सुमित्रानंदन पंत





स्तब्ध ज्योतसना(पृथ्वी पर छिटकी हुई चांदनी ) में जब संसार 
चकित रहता शिशु सा नादान ,
विश्व के पलकों पर सुकुमार 
विचरते हैं जब स्वप्न अजान(अज्ञात) ;

न जाने नक्षत्रो से कौन 
निमंत्रण देता मुझको मौन !

सघन मेघो का भीमाकाश 
गरजता है जब तमसाकार(अन्धेरा ) ,
दीर्घ भरता समीर निःस्वास 
प्रखर झरती जब पावस - धार;

न जाने ,तपक तरित(आकाशीय बिजली) में कौन 
मुझे इंगित करता तब मौन !

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देख वसुधा का यौवन भार 
गूंज उठता है तब मधुमास (चैत्र मास ,वसंत ऋतु ),
विधुर उर के-से मृदु उद्गार 
कुसुम जब खुल पड़ते सोच्छ्वास ;

न जाने सौरभ के मिस कौन 
संदेशा मुझे भेजता मौन !

छुब्ध (क्रोध सेभरा हुआ )जल शिखरों को जब बात 
सिंधु में मथकर फेनाकार ,
 बुलबुलो का व्याकुल संसार 
बना, बिथुरा देती अज्ञात!

उठा तब लहरों से कर कौन 
 न जाने, मुझे बुलाता कौन !

स्वर्ण,सुख, श्री सौरभ में भोर 
विश्व को देती है जब  बोर ,
विहग कुल की कल कंठ - हिलोर 
मिला देती भू नभ के छोर ;

न जाने, अलस पलक - दल कौन 
खोल देता तब मेरे मौन !

तुमुल(कोलाहल) तम में जब एकाकार 
ऊंघता एक साथ संसार,
भीरु झींगुर - कुल की झंकार 
कँपा  देती निद्रा के तार ;

न जाने,खद्दोतो(जुगनू) से कौन 
मुझे पथ दिखलाता तब मौन !

कनक(धतूरा ) छाया में जबकि सकल 
खोलती कालिका(काला रंग) उर के द्वार ,
सुरभि पीड़ित मधुपों(मयखाना) के बाल 
तड़प, बन जाते हैं गुंजार ;

न जाने, ढुलक ओश में कौन 
खींच लेता मेरे दृग मौन !

बिछा कार्यो का गुरुतर भार 
दिवस को दे सुवर्ण अवसार ,
शुन्य सय्या में श्रमित अपार 
जुड़ाता जब मै  आकुल प्राण ;

न जाने, मुझे स्वप्न में कौन
फिराता छाया - जग में मौन !

 न जाने कौन आये द्युतिमान   
जान मुझको अबोध,अज्ञान, 
सुझाते हो तुम पथ  अजान 
फूंक देते छिद्रो में गान ;

अहे सुख-दुःख के सहचर मौन 
नहीं कह सकता तुम हो कौन !

सुमित्रानंदन पंत 


मौन निमंत्रण कविता की व्याख्या :--


" भावार्थ "


प्रकृति के सुकुमार कहे जाने वाले, यह कविता सुमित्रानंदन पंत द्वारा, प्रकृति से सम्मोहित और भाव - विभोर होकर लिखी गई है। यह कविता रात में बिखरी हुई चाँदनी और उसकी सुंदरता को निखारती है। उनका  इस कविता के माध्यम से कहना था  कि जब पृथ्वी पर चाँदनी की छटा छिटकती है तब पूरा संसार इसे स्तब्ध देखता रहता है ,जैसे कि  विश्व के पलकों पर कोई अज्ञात और नाजुक सा स्वप्न विचरण कर रहा हो और नक्षत्रो से कोई उन्हें बुला रहा हो।
उन्हें लगता है, जब मेघो से भरा बिशाल काला आकाश गरजता है और हवाओ का दीर्घ स्वांस लेकर अमृत की  धार की वर्षा होती है तो जैसे उन्हें आकाश से बिजली की चमक के द्वारा कोई इंगित कर रहा होता है। 
इस पावस धार के बाद पृथ्वी का जो यौवन अर्थात वसंत की खूबसूरती खुलकर निखरती है। 
तो किसी विधुर का भी ह्रदय मीठे उद्गार ,मीठे मनोवृत्ति की वेग से भर उठता है। कुसुम सा खिल उठता है और उसकी सुगंध के द्वारा उन्हें कोई मीठा सन्देश भेजता है। 
कभी उन्हें लगता है जैसे , क्रोध से भरे हुए जल शिखर सिंधु में मथकर व्याकुल हो, फेन और बुलबुले से भरे हुए कोई अज्ञात पीड़ा की लहर उद्वेगित  हो  रहा हो।     
तो कभी स्वर्ण सा सुख और खुशबु से भरी हुई सुबह और कोयल की मधुर बोल से  संसार को  सराबोर कर देती है  ,जैसे आकाश और धरा का छोर दोनों एक दूसरे से मिल रहे हो और न जाने फिर कौन सा अलस पलक -दल  उनके मौन को तोड़ देता है। 
रात्रि में जब पूरा संसार  एकाकार हो निद्रा की आवेश में ऊंघता  है तब झींगुरो की झनकार और कोलाहल में न जाने कैसे जुगनुओं के झुंड अंधियारे में उसे चुपचाप राह दिखाता है।
  धतूरे के नसें में अँधेरे से भरा मन और दर्द से भरा रोम मयखाने में ओश  की तरह ढुलकते हुए मेरे अटल मन को खिंच लेता है।  
कार्यो का गुरुत्वपूर्ण भार दिन को सुवर्ण अवसर देकर और अपार श्रम के बाद जब शुन्य सैयां  पर होता हूँ तो न जाने कौन, मौन सा मुझे छाया जग में स्वप्न सा घुमाता है।  
न जाने कौन है जो आये और मुझ अज्ञानी और नासमझ को अनजान सा पथ  बुझाते हुए मेरे रोम  छिद्रो  में सजीवता का गान भर दे। 
हमेसा मौन   रहने वाले हे सुख - दुःख के  साथी तुम कौन हो !  

 
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